सच की गवाही
इल्ज़ाम की आँधी में भी किरदार नहीं झुकता, अल्लाह की अदालत में सच कभी नहीं छुपता। बदनाम करने वालों ने हर हद को पार किया, मगर झूठ का क़िस्सा हमेशा नहीं चलता। बिना जाने किसी पर उँगली उठाने वालों, हर लफ़्ज़ का हिसाब है, कोई लफ़्ज़ नहीं मिटता। ख़ामोश थीं आँखें, मगर रब को ख़बर थी, मज़लूम का आँसू कभी बेकार नहीं जाता। नाज़, ये सबक़ है हमें सूरह-ए-नूर से, सच देर से आए, मगर पर्दे में नहीं रहता।