Posts

सच की गवाही

इल्ज़ाम की आँधी में भी किरदार नहीं झुकता, अल्लाह की अदालत में सच कभी नहीं छुपता। बदनाम करने वालों ने हर हद को पार किया, मगर झूठ का क़िस्सा हमेशा नहीं चलता। बिना जाने किसी पर उँगली उठाने वालों, हर लफ़्ज़ का हिसाब है, कोई लफ़्ज़ नहीं मिटता। ख़ामोश थीं आँखें, मगर रब को ख़बर थी, मज़लूम का आँसू कभी बेकार नहीं जाता। नाज़, ये सबक़ है हमें सूरह-ए-नूर से, सच देर से आए, मगर पर्दे में नहीं रहता।

हर बार तुझे थाम लेगा

गिराने वाले हर बार तुझे गिराएँगे, वो रब है, हर बार तुझे थाम लेगा। तू टूटकर भी अपने यक़ीं को न खोना, वो तेरे बिखरे हुए हौसलों को सँभाल लेगा। ज़माना चाहे तुझे तन्हा ही छोड़ दे, वो तेरी ख़ामोशी को भी जान लेगा। नाउम्मीद होकर तू दर से न लौटना, वो तेरी हर आह का जवाब दे देगा। तेरे हिस्से में अगर इम्तिहान लिखे हैं, वो हर मुश्किल में तुझे रास्ता दे देगा। नाज़, तू बस अपने रब पर यक़ीं रखना, वो सारी दुनिया का मालिक है, तुझे थाम लेगा।

नाज़, सूरह-ए-नूर का पैग़ाम याद रख,

झूठ की गर्दिशों में सच को दबाया गया, एक पाक दामन को यूँ आज़माया गया। बिन सबूत के लफ़्ज़ों ने क़हर ढाया था, एक अफ़वाह को शहर में फैलाया गया। वो ख़ामोश थीं, मगर रब तो जानता था, हर इल्ज़ाम से पहले भी सच को पाया गया। आयतें उतरीं तो दुनिया को ये मालूम हुआ, जिसे लोगों ने गिराया, उसे उठाया गया। ऐ ज़ुबाँ, सोच कि तू किसका हिसाब लिखती है, हर बयान का वज़्न तराज़ू में तौला गया। नाज़, सूरह-ए-नूर का पैग़ाम याद रख, झूठ चाहे जितना हो, सच को बचाया गया।

मत ढूँढ तू मुझे पुराने ख़तों में,

मत ढूँढ तू मुझे पुराने ख़तों में, वहाँ जो मैं हूँ, वो अब मैं नहीं हूँ। उन लफ़्ज़ों में एक ऐसा शख़्स रहता है जो छोटी-सी बात पर मुस्कुरा देता था, जो इंतज़ार को भी मोहब्बत समझता था। स्याही सूख गई है, मगर कुछ बातें अब भी गीली हैं। कुछ ख़तों में मेरी हँसी रखी है, कुछ में मेरी ख़ामोशी, और कुछ में वो सारे वादे जिन्हें वक़्त ने पढ़कर चुपचाप फाड़ दिया। तू मुझे वहाँ मत ढूँढ मैं उन काग़ज़ों से बहुत आगे निकल आया हूँ। अब जो मैं हूँ, वो किसी ख़त में नहीं मिलता। उसे पाने के लिए तुझे मेरे आज में आना होगा क्योंकि पुराने ख़त सिर्फ़ बताते हैं कि हम कौन थे, ये नहीं बताते कि हम क्या हो चुके हैं।

तुम नदी की तरह हो...

तुम नदी की तरह हो शांत दिखती हो, मगर अपने भीतर पूरा एक शोर लिए चलती हो। कभी पत्थरों से टकराती हो, कभी रास्ता बदल लेती हो, मगर रुकती नहीं। तुम्हें बाँधने की कोशिश करो तो तुम रास्ता बदल लेती हो, और छोड़ दो तो जाने कितनी दूर अपना रास्ता ख़ुद बना लेती हो। तुम्हारे पास लौटकर आने वाले किनारे वही रहते हैं, मगर तुम हर बार थोड़ी अलग होती हो। शायद इसलिए तुम्हें समझना मुश्किल है तुम्हें छुआ जा सकता है, तुम्हारे पास बैठा जा सकता है, तुम्हारी आवाज़ सुनी जा सकती है, मगर तुम्हें अपने पास रखा नहीं जा सकता। तुम नदी की तरह हो बहना तुम्हारी फ़ितरत है, और शायद इसीलिए तुम्हारी सबसे ख़ूबसूरत बात ये है कि तुम किसी की होकर भी किसी की मिल्कियत नहीं होती।

कैसे समझाऊं तुम्हे!

 कैसे समझाऊं तुम्हे! तुमसे मोहब्बत मेरे इख़्तियार मैं नहीं थी।

ए- मेरी मोहब्बत

 मेरी हर सांस अमानत है तेरी यादों की,  ए- मेरी मोहब्बत  तू ही बता, अब टूट कर इससे ज्यादा तुझे चाहूं तो कैसे?