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शायद में...

शायद में नींद में हुँ इसलिए बार-बार लड़खड़ा रही हूँ,  शायद इस बार सोदा मेने अपना किया था इसलिए बार-बार हार रही हूँ।

बहुत कम शब्दों में...

बहुत कम शब्दों में बहुत कुछ लिखना है, जिंदगी बहुत छोटी है जब तक सांस चलेगी तब तक जीना है।

किसी दिन वह..

किसी दिन वह इंसान तो रहेगा मगर उससे राब्ता करने का जरिया न मिलेगा....

किसी दिन वह..

किसी दिन वह इंसान तो रहेगा मगर उससे राब्ता करने का जरिया न मिलेगा....

लोग परखते है....

लोग परखते है मुझे मेरी बातों से, मेरी मुस्कुराहट से, मेरे लिबास से, मेरे गुस्से से, मेरे आंखों से,कोई मिला नही ऐसा जो समझे मुझे मेरी बातों में छुपे जज्बातों से, मेरी मुस्कुराहट में छुपे खामोशी से, मेरे लिबास में छुपे जख्मों से, मेरे गुस्से में छुपे प्यार से, मेरे आंखों में छुपे दर्द से....कोई मिल ही नहीं...

हमें..

हमें कोई लगावट दिखाता है तो हमें डर लगता है,क्योंकि हर बार लगावट हमें खा गया है।

जिंदगी तमाशा नहीं...

जिंदगी तमाशा नहीं जिसे देखने को हुजूम आए, कम लोग हो लेकिन पसंदीदा लोग हो,  जो हुजूम-ए-आम तक साथ चले।