तुम नदी की तरह हो...
तुम नदी की तरह हो शांत दिखती हो, मगर अपने भीतर पूरा एक शोर लिए चलती हो। कभी पत्थरों से टकराती हो, कभी रास्ता बदल लेती हो, मगर रुकती नहीं। तुम्हें बाँधने की कोशिश करो तो तुम रास्ता बदल लेती हो, और छोड़ दो तो जाने कितनी दूर अपना रास्ता ख़ुद बना लेती हो। तुम्हारे पास लौटकर आने वाले किनारे वही रहते हैं, मगर तुम हर बार थोड़ी अलग होती हो। शायद इसलिए तुम्हें समझना मुश्किल है तुम्हें छुआ जा सकता है, तुम्हारे पास बैठा जा सकता है, तुम्हारी आवाज़ सुनी जा सकती है, मगर तुम्हें अपने पास रखा नहीं जा सकता। तुम नदी की तरह हो बहना तुम्हारी फ़ितरत है, और शायद इसीलिए तुम्हारी सबसे ख़ूबसूरत बात ये है कि तुम किसी की होकर भी किसी की मिल्कियत नहीं होती।