मत ढूँढ तू मुझे पुराने ख़तों में, वहाँ जो मैं हूँ, वो अब मैं नहीं हूँ। उन लफ़्ज़ों में एक ऐसा शख़्स रहता है जो छोटी-सी बात पर मुस्कुरा देता था, जो इंतज़ार को भी मोहब्बत समझता था। स्याही सूख गई है, मगर कुछ बातें अब भी गीली हैं। कुछ ख़तों में मेरी हँसी रखी है, कुछ में मेरी ख़ामोशी, और कुछ में वो सारे वादे जिन्हें वक़्त ने पढ़कर चुपचाप फाड़ दिया। तू मुझे वहाँ मत ढूँढ मैं उन काग़ज़ों से बहुत आगे निकल आया हूँ। अब जो मैं हूँ, वो किसी ख़त में नहीं मिलता। उसे पाने के लिए तुझे मेरे आज में आना होगा क्योंकि पुराने ख़त सिर्फ़ बताते हैं कि हम कौन थे, ये नहीं बताते कि हम क्या हो चुके हैं।
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